कॉर्बेट में बाघों की गिनती में महिला शक्ति की दहाड़, तीन चरणों में जारी ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन
विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में इन दिनों ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन का महत्वपूर्ण अभियान पूरे जोश के साथ चल रहा है। इस महाअभियान में जहां आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक पद्धतियों का सहारा लिया जा रहा है, वहीं महिला वनकर्मियों की सक्रिय भागीदारी इस प्रक्रिया को और अधिक सशक्त बना रही है। दुर्गम जंगलों में बाघों की गणना कर रहीं महिला वन दरोगा मानसी अरोड़ा और उनकी टीम महिला सशक्तिकरण की एक नई मिसाल पेश कर रही हैं।
तीन चरणों में होने वाली इस गिनती में कॉर्बेट के घने और कठिन जंगलों में महिला वन दरोगा मानसी अरोड़ा अपनी टीम के साथ लगातार फील्ड में डटी हुई हैं। उन्होंने बताया कि बाघों की गणना केवल कैमरा ट्रैप तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके लिए जंगल के हर कोने में पैदल चलकर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संकेत एकत्र करने पड़ते हैं। इस चुनौतीपूर्ण कार्य में उनके साथ रेंज अधिकारी नवीन चंद्र पांडे, रमन सिंह, मोहन उप्रेती सहित कई अनुभवी वनकर्मी भी शामिल हैं, जो दिन-रात कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर डेटा जुटा रहे हैं।
गौरतलब है कि इस समय देशभर में अखिल भारतीय बाघ आकलन किया जा रहा है और बाघों के घनत्व के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में यह प्रक्रिया विशेष सतर्कता के साथ चल रही है। पार्क प्रशासन ने इसके लिए कई टीमें गठित की हैं, जिनमें महिला वनकर्मियों की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिल रही है।
यह बाघ गणना दुनिया की सबसे बड़ी वाइल्डलाइफ एक्सरसाइज मानी जाती है और इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है। पूरी प्रक्रिया तीन चरणों में संपन्न होती है।
पहला चरण – साइन सर्वे:
इस चरण में वनकर्मी पूरे क्षेत्र में घूमकर बाघों और अन्य वन्यजीवों के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष संकेत एकत्र करते हैं। इनमें बाघों के पदचिन्ह, मल, पंजों के निशान, पेड़ों और जमीन पर खरोंच जैसे साक्ष्य शामिल होते हैं। यह पूरा डेटा इकोलॉजी एप और एम-स्ट्राइप्स (M-STrIPES) ऐप के माध्यम से मोबाइल फोन में दर्ज किया जाता है। साथ ही हाथी जैसे अन्य प्रमुख वन्यजीवों के संकेत भी रिकॉर्ड किए जाते हैं।
दूसरा चरण – ट्रांजिट लाइन वॉक:
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला के अनुसार, इस चरण में पूर्व निर्धारित दो किलोमीटर लंबी ट्रांजिट लाइनों पर वनकर्मी जीपीएस, रेंज फाइंडर, कम्पास और मोबाइल के साथ पैदल चलते हैं। इस दौरान शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या और उपस्थिति का आकलन किया जाता है, क्योंकि इन्हीं पर बाघों की आबादी निर्भर करती है। एक बीट में वनकर्मी 5 से 15 किलोमीटर तक पैदल चलकर पूरा क्षेत्र कवर करते हैं।
तीसरा चरण – कैमरा ट्रैपिंग:
अंतिम चरण में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पूरे क्षेत्र में 1050 से अधिक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार हर दो किलोमीटर पर एक पॉइंट पर दो कैमरे लगाए गए हैं। कुल 550 से अधिक पॉइंट्स पर ये कैमरे 45 दिनों तक सक्रिय रहेंगे और वनकर्मी नियमित रूप से उनकी निगरानी कर रहे हैं।
डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि कैमरा ट्रैप से प्राप्त तस्वीरों को पहले एआई आधारित सॉफ्टवेयर में प्रोसेस किया जाता है, जिसके बाद ‘एक्सट्रैक्ट-कम्पेयर’ सॉफ्टवेयर से बाघों की धारियों का मिलान कर प्रत्येक बाघ की अलग-अलग पहचान की जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कौन-सा बाघ किस क्षेत्र में और किस समय मौजूद था।
उन्होंने बताया कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व को राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र और कालागढ़ क्षेत्र—दो भागों में विभाजित कर यह कार्य किया जा रहा है। फिलहाल ट्रांजिट लाइन और ट्रांजिट वॉक का कार्य पूरा हो चुका है, जबकि कैमरा ट्रैपिंग का चरण जारी है।
महिला वनकर्मियों की सक्रिय भूमिका न केवल इस वैज्ञानिक अभियान को मजबूती दे रही है, बल्कि वन संरक्षण के क्षेत्र में महिला शक्ति की प्रभावी भागीदारी को भी उजागर कर रही है।

