न उम्र की दीवार, न बीमारी की बेड़ियां—वेटरन खिलाड़ियों ने साबित किया जज्बा ही असली ताकत
जब हौसले बुलंद हों, तो उम्र की सीमा और गंभीर बीमारियां भी इंसान की रफ्तार को थाम नहीं पातीं। अलवर में आयोजित युवरानी महेन्द्र कुमारी ओपन नेशनल खेल प्रतियोगिता में वेटरन खिलाड़ियों ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया। 60 वर्ष से लेकर 90 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के खिलाड़ियों ने ट्रैक और फील्ड में उतरकर यह साबित कर दिया कि खेलों के लिए जुनून ही सबसे बड़ी ऊर्जा है।
राजर्षि खेल मैदान में बुजुर्ग खिलाड़ियों को दौड़ते, गोला फेंकते और छलांग लगाते देख दर्शक भी हैरान रह गए। यह प्रतियोगिता केवल खेल का मंच नहीं, बल्कि जिंदादिली और आत्मविश्वास का उत्सव बन गई।
91 साल की उम्र में भी गोल्ड मेडल, रामचंद्र बने प्रेरणा
अलवर जिले के नंगली धमावत निवासी 91 वर्षीय रामचंद्र ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उम्र सिर्फ एक संख्या है। 2000 मीटर रेस में हिस्सा लेकर उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया। रामचंद्र इससे पहले भी कई प्रतियोगिताओं में मेडल जीत चुके हैं।
उन्होंने बताया कि शुद्ध घरेलू भोजन और नियमित दिनचर्या ही उनकी सेहत का राज है। यही वजह है कि वे आज भी बिना चश्मे के किताबें पढ़ लेते हैं। अच्छे प्रदर्शन के चलते उन्हें विदेश में प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का मौका भी मिला था, लेकिन परिस्थितियों के कारण वे नहीं जा सके। उनका कहना है कि भविष्य में वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम जरूर रोशन करेंगे।
88 साल में भी फिटनेस का कमाल
भिवानी से आए 88 वर्षीय खिलाड़ी ने बताया कि खेलों के प्रति उनका लगाव हमेशा से रहा है। वे 5 किलोमीटर वॉक, लॉन्ग जंप और ट्रिपल जंप जैसे इवेंट्स में हिस्सा लेते हैं। वे सेना से जुड़ी प्रतियोगिताओं में भी भाग ले चुके हैं और एशियन गोल्ड मेडलिस्ट रह चुके हैं।
कैंसर को दी मात, युवाओं को दे रहे कड़ी टक्कर
हरियाणा के हिसार जिले के सतवीर सिंह पूनिया पिछले छह साल से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, लेकिन उनका खेल प्रेम कमजोर नहीं पड़ा। 73 साल की उम्र में भी वे 5 किलोमीटर पैदल चाल में युवाओं को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
सतवीर बताते हैं कि खेलों में हिस्सा लेने से उन्हें मानसिक और शारीरिक मजबूती मिलती है। वे देश के कई राज्यों में आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर मेडल जीत चुके हैं। उनका खानपान भी अनुशासित है—फल और मिलेट्स पर आधारित डाइट और समयबद्ध भोजन उनकी फिटनेस का आधार है।
हजारों किलोमीटर का सफर तय कर भारत आते हैं खेलने
पंजाब निवासी हरदेव सिंह, जो 1972 से कनाडा में रह रहे हैं, हर साल भारत आकर वेटरन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। शॉट पुट, जैवलिन थ्रो, डिस्कस थ्रो और हर्डल रेस जैसे इवेंट्स में वे अब तक 50 से अधिक अंतरराष्ट्रीय और भारत में 400 से ज्यादा मेडल जीत चुके हैं।
उन्होंने अमेरिका, कनाडा और साउथ कोरिया सहित कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। हरदेव कहते हैं कि खेलों के कारण ही वे आज भी खुद को युवा महसूस करते हैं।
हादसे के बाद भी नहीं टूटा हौसला, अब युवाओं को दे रहे प्रशिक्षण
अलवर के मनोज कुमार के लिए खेल सफर आसान नहीं रहा। 2014 में एक हादसे में उनके पैर फ्रैक्चर हो गए, जिसके बाद एक साल तक वे खेलों से दूर रहे। लेकिन जज्बे ने उन्हें फिर मैदान में लौटने की ताकत दी।
उन्होंने 2025 में टाइगर मैराथन की 21 किलोमीटर दौड़ पूरी की और वेटरन प्रतियोगिता में भी मेडल जीता। आज वे बच्चों को खेलों और डिफेंस सेक्टर की तैयारी करवा रहे हैं, जिससे कई युवा देश सेवा के क्षेत्र में चयनित हो चुके हैं।
संदेश साफ है—जुनून हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं
इस प्रतियोगिता में शामिल वेटरन खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि खेल केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। सही जीवनशैली, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ कोई भी उम्र खेल के मैदान में इतिहास रच सकती है।

